विवाह में बाधक योग ओर ज्योतिष शास्त्र


*विवाह में बाधक योग ओर ज्योतिष शास्त्र

विवाह में बाधक योग ओर ज्योतिष शास्त्र

परिचय

विवाह, मानव जीवन की एक खास और महत्वपूर्ण घटना है जो एक नए जीवन की शुरुआत को संकेत करती है। विवाह का यह संबंध पति-पत्नी के बीच साझा किया जाता है जिसमें दोनों के बीच स्नेह, समझदारी और सहमति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि विवाह एक खुशियों भरे सफर को आरंभ करने का एक माध्यम हो सकता है, कई बार ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुछ बाधक योग बन सकते हैं जो इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।

विवाह में बाधक योग का मतलब

विवाह में बाधक योग ज्योतिष शास्त्र में विवाह के प्रति स्वयं के अवांछित विरोध और बाधाएँ होने की संभावना को दर्शाते हैं। यह ग्रहों की स्थितियों और कुंडली के योग के माध्यम से निर्धारित किया जाता है। विवाह में बाधक योगों की मौजूदगी विवाह के लिए अनिष्ट घटनाओं की संभावना को बढ़ा सकती है, जैसे कि संबंधों में असहमति, विशेषज्ञता की कमी और विश्वासघातक व्यवहार।

विवाह में बाधक योगों के प्रकार

1. ग्रहों की आपसी विरोधिता

विवाह में बाधक योगों में पहले प्रकार के योग में ग्रहों की आपसी विरोधिता शामिल है। यदि व्यक्ति की कुंडली में विवाह के लिए महत्वपूर्ण ग्रहों में विरोध होता है, तो विवाह की प्रक्रिया में दिक्कतें आ सकती हैं। यह विरोधिता विवाह में समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है और संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है।

2. कुंडली में दोष

दूसरे प्रकार के विवाह में बाधक योग के रूप में कुंडली में दोष शामिल होते हैं। कुंडली में ऐसे दोष होने पर व्यक्ति को विवाह की प्रक्रिया में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इन दोषों को ठीक करने के लिए उपाय भी आवश्यक हो सकते हैं।कुंडली में दोष एक ऐसी स्थिति होती है जब व्यक्ति की जन्मकुंडली में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति में अनुशासन या अनियमितता होती है। यह दोष विवाह की प्रक्रिया में आने वाली कठिनाइयों का कारण बन सकते हैं और विवाह के बाद संबंधों में समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं।

कुंडली में दोष होने के कई प्रकार हो सकते हैं, जैसे कि मांगलिक दोष, कालसर्प दोष, ग्रहण दोष आदि। ये दोष व्यक्ति की कुंडली में विशिष्ट ग्रहों और नक्षत्रों के स्थानांतरण के कारण हो सकते हैं और इनका प्रभाव विवाह और परिवार में असमंजस उत्पन्न कर सकता है।

कुंडली में दोष होने पर व्यक्ति को विवाह की प्रक्रिया में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इन दोषों के कारण विवाह की समयबद्धता में दिक्कतें आ सकती हैं और उनके विवाह के लिए सही साथी की खोज में भी बाधाएँ आ सकती हैं। इसके अलावा, दोष होने के कारण विवाह के बाद भी संबंधों में तकलीफें उत्पन्न हो सकती हैं और परिवार में विवादों का कारण बन सकते हैं।

कुंडली में दोष होने पर व्यक्ति को उपाय का पालन करने की सलाह दी जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, उपायों का पालन करके दोष को शांत किया जा सकता है और व्यक्ति की शादी और परिवार में सुख-शांति की दिशा में सुधार किया जा सकता है। ये उपाय ग्रहों की शांति के लिए होते हैं और व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

ज्योतिष शास्त्र की मदद से संबंधों को बनाएं मजबूत

विवाह में बाधक योगों की पहचान करने के बाद, उन्हें दूर करने के उपायों का पालन करके संबंधों को मजबूत बनाया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र विशेषज्ञों की सलाह लेना भी फायदेमंद साबित हो सकता है। वे आपको सही दिशा में मार्गदर्शन करेंगे और संबंधों में सुख और समृद्धि प्राप्त करने के उपायों के बारे में बताएंगे।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, विवाह जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू होता है जिसमें ग्रहों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। कुछ समयों में, कुछ ग्रहों की स्थितियाँ विवाह में बाधक योग पैदा कर सकती हैं, जिससे विवाह में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यहां तक कि ज्योतिष शास्त्र इन योगों के प्रभाव को प्राकृतिक और वैज्ञानिक तरीकों से समझने की कोशिश करता है।

विवाह में बाधक योग के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं:

  1. मांगलिक दोष (मंगल दोष): मंगल दोष एक प्रमुख विवाह में बाधक योग है, जिसमें मंगल ग्रह (मार्स) की अशुभ स्थिति होती है। यह योग विवाह में चुनौतियों को ला सकता है और विवाहित जीवन में समस्याएँ पैदा कर सकता है।

  2.  मांगलिक दोष कैसे होता है और उसके उपाय

  3. मांगलिक दोष एक ऐसा ज्योतिषीय दोष है जिसमें जन्मकुंडली में मंगल ग्रह का विशेष स्थान या योग होता है। इसका मतलब होता है कि कुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है और विवाह की प्रक्रिया में इसका प्रभाव पड़ सकता है। मांगलिक दोष को गुण मिलान या विवाह में बाधाएँ उत्पन्न करने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

    मांगलिक दोष के प्रमुख कारण

    जन्मकुंडली में मंगल ग्रह की यदि पाप दृष्टि होती है, तो उसके कारण मांगलिक दोष उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा, जन्मकुंडली में मंगल ग्रह की यदि कुछ विशेष स्थान पर स्थिति हो, तो भी मांगलिक दोष उत्पन्न हो सकता है।

    मांगलिक दोष के प्रभाव

    मांगलिक दोष के प्रभाव से व्यक्ति के विवाह में कठिनाइयाँ आ सकती हैं। इसके कारण विवाह की समयबद्धता में दिक्कतें उत्पन्न हो सकती हैं और सही साथी की खोज में बाधाएँ आ सकती हैं। विवाह के बाद भी मांगलिक दोष के कारण संबंधों में असमंजस और तकलीफें उत्पन्न हो सकती हैं।

    मांगलिक दोष के उपाय

    ज्योतिष शास्त्र में मांगलिक दोष के उपाय बताए गए हैं जिनका पालन करके इस दोष को दूर किया जा सकता है। कुछ उपाय निम्नलिखित हैं:

    • मंगल की पूजा: मंगल ग्रह की पूजा करने से मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
    • दान करना: दान करने से भी मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
    • कुंडली मिलान: विवाह के लिए उपयुक्त साथी का चयन करते समय कुंडली मिलान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    • मंत्रों का जाप: ज्योतिष शास्त्र में बताए गए कुछ मंत्रों का जाप करने से भी मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
    • मांगलिक दोष कैसे होता है और उसके उपाय: पूजा, दान, मंत्र

      मांगलिक दोष व्यक्ति की जन्मकुंडली में मंगल ग्रह के विशेष स्थान पर प्राप्त होने से उत्पन्न होता है। इसका मतलब होता है कि जब व्यक्ति की कुंडली में मंगल ग्रह का पाप या दोषी स्थिति होती है, तो उसे मांगलिक दोष होता है। इसका विवाह की प्रक्रिया में प्रभाव हो सकता है और विवाह के बाद भी संबंधों में कठिनाइयाँ आ सकती हैं।

      मांगलिक दोष के प्रमुख कारण

      मांगलिक दोष के प्रमुख कारण ये होते हैं:

      1. मंगल ग्रह की पाप दृष्टि: जन्मकुंडली में मंगल ग्रह की पाप दृष्टि होने से मांगलिक दोष उत्पन्न हो सकता है।
      2. मंगल ग्रह की अनुकूल दृष्टि: कई बार मंगल ग्रह की अनुकूल दृष्टि होने से भी मांगलिक दोष हो सकता है।
      3. कुंडली में मंगल ग्रह की योग: जन्मकुंडली में मंगल ग्रह की कुछ विशेष स्थानों पर स्थिति होने से भी मांगलिक दोष उत्पन्न हो सकता है।

      मांगलिक दोष के प्रभाव

      मांगलिक दोष के प्रभाव से व्यक्ति के विवाह में कठिनाइयाँ आ सकती हैं। इसके कारण विवाह की समयबद्धता में दिक्कतें उत्पन्न हो सकती हैं और सही साथी की खोज में बाधाएँ आ सकती हैं। विवाह के बाद भी मांगलिक दोष के कारण संबंधों में तकलीफें उत्पन्न हो सकती हैं।

      मांगलिक दोष के उपाय

      मांगलिक दोष के उपाय विभिन्न रूपों में आते हैं जो व्यक्ति को इस दोष के प्रभाव से बचाने में मदद करते हैं:

      • पूजा और अर्चना: मांगल ग्रह की पूजा और अर्चना करने से मांगलिक दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
      • दान और पुण्य कार्य: दान और पुण्य कार्य करने से भी मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
      • मंत्र जाप: कुछ विशेष मंत्रों का जाप करने से भी मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो सकता है।
  4. मंगलिक दोष के उपाय:

    • मंगल की शुभता के लिए मंगलवार के दिन लाल कपड़े पहनें और हनुमान जी की पूजा करें।
    • मंगल ग्रह के लिए कुंडली मिलान करने से विवाह में सुख और समृद्धि मिल सकती है।
    • मांगलिक दोष का उपाय: पूजा और अर्चना

      मांगलिक दोष एक ज्योतिषीय दोष होता है जो जन्मकुंडली में मंगल ग्रह की पाप या दोषी स्थिति के कारण उत्पन्न होता है। यह विवाह की प्रक्रिया में बाधाएँ उत्पन्न कर सकता है और संबंधों में कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है। मांगलिक दोष से बचाव के लिए धार्मिक उपायों में से एक है पूजा और अर्चना।

      मांगलिक दोष के पूजा और अर्चना

      1. मंगल ग्रह की पूजा: मांगल दोष के प्रभाव को कम करने के लिए मंगल ग्रह की पूजा करना महत्वपूर्ण होता है। इस पूजा में विशेष रूप से मंगल ग्रह को अपने इष्ट देवता के रूप में पूजा जाता है और उसके शुभ प्रभाव की प्राप्ति की जाती है।

      2. मंगल ग्रह की अर्चना: अर्चना का मतलब होता है मंगल ग्रह की उपासना करना। इस उपाय में व्यक्ति मंगल ग्रह की आराधना करता है और उसके शुभ प्रभाव की कामना करता है।

      3. मंत्र जाप: मंत्र जाप करने से भी मांगलिक दोष का प्रभाव कम हो सकता है। विशेष रूप से "ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः" यह मंत्र मंगल ग्रह की शक्ति को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।

      4. व्रत और उपवास: मांगलिक दोष के प्रभाव को कम करने के लिए व्रत और उपवास भी किए जा सकते हैं। व्यक्ति एक विशेष दिन या दिनों में मंगल ग्रह की पूजा और उपवास कर सकता है।

      5. दान और पुण्य कार्य: दान और पुण्य कार्य करने से भी मांगलिक दोष के प्रभाव कम हो सकता है। व्यक्ति किसी अच्छे कार्य में शामिल होकर अच्छे कर्म कर सकता है और इसके जरिए अपने दोष को शांत कर सकता है।

      6. ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञ से सलाह: मांगलिक दोष के प्रभाव को समझने और उसके उपायों के बारे में जानने के लिए ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञ से सलाह लेना भी महत्वपूर्ण होता है।

    • मंगल ग्रह की पूजा विधान

    • मंगल ग्रह की पूजा करने से मांगलिक दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है और व्यक्ति को संतान, स्वास्थ्य, विवाह और संबंधों में सुख-शांति मिल सकती है। निम्नलिखित है मंगल ग्रह की पूजा के विधान:

      सामग्री:

      1. पूजा स्थल: शुभ और शुद्ध स्थान पर पूजा करना चाहिए, जैसे कि पूजा घर या मंदिर।
      2. पूजा सामग्री: मंगल ग्रह की मूर्ति या तस्वीर, लाल रंग की पट्टी, दूध, दूध से बनी मिठाई, गुड़, सुपारी, चावल, दीपक, धूप, अगरबत्ती, फूल आदि।

      पूजा विधि:

      1. अंधकार निवारण: पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद, अंधकार को दूर करने के लिए दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
      2. अवाहन: मंगल ग्रह की मूर्ति को सामने रखें और मन में उनका आवाहन करें।
      3. प्राण प्रतिष्ठा: मंगल ग्रह की मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा दें, यानी उन्हें जीवंत मानें और उनका स्वागत करें।
      4. पूजा आराम्भ: मंगल ग्रह की पट्टी को उनकी मूर्ति पर रखें और उन्हें चावल, सुपारी, मिठाई, गुड़ आदि से पूजन करें।
      5. मंत्र जाप: "ॐ कुजाय नमः" या "ॐ अंगारकाय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
      6. आरती: मंगल ग्रह की मूर्ति की आरती करें और उन्हें धूप और दीपक से पूजन करें।
      7. प्रसाद वितरण: पूजा के बाद बनाया हुआ प्रसाद दीपक, दूध, मिठाई, गुड़, सुपारी आदि के साथ देवी की मूर्ति के चारों ओर घुमाएं और फिर उसे देवों के बीच में बांटें।

      पूजा का समापन:

      पूजा को समाप्त करने के बाद, मंगल ग्रह की मूर्ति का समापन करें और उनका ध्यान करते हुए अपनी कार्यों में सफलता की कामना करें।

  5. मंगल ग्रह मंत्र जाप का विधान

    मंगल ग्रह का मंत्र जाप करने से मांगलिक दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है और व्यक्ति को संतान, स्वास्थ्य, विवाह और संबंधों में सुख-शांति मिल सकती है। यहाँ निम्नलिखित है मंगल ग्रह के मंत्र का जाप करने का विधान:

    सामग्री:

    1. मंगल ग्रह मंत्र: "ॐ कुजाय नमः" या "ॐ अंगारकाय नमः"
    2. माला: कुंडली में मंगल ग्रह के अनुसार 108 मन्त्रों का जाप करने के लिए माला।
    3. पूजन सामग्री: दीपक, धूप, अगरबत्ती, फूल, दूध, गुड़, सुपारी आदि।

    मंत्र जाप विधी:

    1. प्रारंभ: शुद्ध और शांतिपूर्वक बैठकर ध्यान केंद्रित करें।
    2. संकल्प: मंगल ग्रह के मंत्र जाप की संकल्प करें, जिसमें आप अपनी इच्छाओं को प्रकट कर सकते हैं।
    3. मंत्र जाप: माला को लेकर ध्यान से मंत्र का जाप करें, प्रत्येक मंत्र को स्पष्ट ध्यान और श्रद्धा के साथ उच्चारण करें।
    4. ध्यान: मंत्र जाप के दौरान मंगल ग्रह की मूर्ति या तस्वीर को ध्यान में रखें और उनके स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करें।
    5. आरती: मंत्र जाप के बाद मंगल ग्रह की आरती करें और उन्हें दीपक, धूप, फूल आदि से पूजन करें।
    6. प्रसाद वितरण: पूजा के बाद बनाया हुआ प्रसाद दीपक, दूध, मिठाई, गुड़, सुपारी आदि के साथ देवी की मूर्ति के चारों ओर घुमाएं और फिर उसे देवों के बीच में बांटें।

    जाप की संख्या:

    मंगल ग्रह के मंत्र का जाप सामग्री की माला के माध्यम से करें, और जाप की संख्या को 108 मंत्रों तक पहुंचाएं। यदि संभावना हो तो आवश्यकतानुसार आधे जाप भी किया जा सकता है, जैसे 54 मंत्रों का जाप।

  6. मंगल ग्रह व्रत और उपवास का विधान

    मंगल ग्रह के व्रत और उपवास से मांगलिक दोष के प्रभाव को कम किया जा सकता है और व्यक्ति को संतान, स्वास्थ्य, विवाह और संबंधों में सुख-शांति मिल सकती है। यहाँ निम्नलिखित है मंगल ग्रह के व्रत और उपवास करने का विधान:

    व्रत का विधान:

    1. सामग्री: व्रत के लिए शुद्ध सामग्री जैसे कि दीपक, धूप, अगरबत्ती, पुष्प, दूध, गुड़, सुपारी, फल आदि।
    2. पूजा स्थल: शुभ और शांतिपूर्वक व्रत स्थल तैयार करें, जैसे कि पूजा घर या मंदिर।
    3. व्रत की आरंभ पूजा: व्रत की आरंभ पूजा करें, जिसमें आप मंगल ग्रह की पूजा करते हैं और उनकी कृपा की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

    व्रत की विधि:

    1. प्रातःकाल पूजा: व्रत के दिन सुबह की पूर्वकाल में, उठते ही शुद्धता के साथ स्नान करें और मंगल ग्रह की मूर्ति के सामने बैठें। उनकी पूजा करें और उनके आशीर्वाद की कामना करें।
    2. मंत्र जाप: "ॐ कुजाय नमः" या "ॐ अंगारकाय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
    3. आरती: मंगल ग्रह की मूर्ति की आरती करें और उन्हें दीपक, धूप, फूल आदि से पूजन करें।

    उपवास का विधान:

    1. सामग्री: व्रत के दिन उपवास के लिए आहार सामग्री तैयार करें, जैसे कि फल, सुपारी, गुड़, दूध आदि।
    2. व्रत आरंभ: व्रत के दिन सुबह की पूर्वकाल में उठते ही शुद्धता के साथ स्नान करें और मंगल ग्रह की मूर्ति के सामने बैठें। उनकी पूजा करें और उनके आशीर्वाद की कामना करें।
    3. उपवासी आहार: उपवास के दिन उपवासी आहार लें, जैसे कि फल, सुपारी, दूध, गुड़, फलियां आदि। आपके व्रत के नियमानुसार आपका आहार होना चाहिए।

  7. शनि साढ़ेसाती: शनि की साढ़ेसाती एक दशा होती है जिसमें शनि ग्रह व्यक्ति की राशि के चार संकेतों पर प्रभाव डालता है। यह दशा विवाह में चुनौतियों को ला सकती है और विवाहित जीवन में संघर्ष पैदा कर सकती है।

  8. शनि साढ़ेसाती के सम्पूर्ण उपाय मंत्रों सहित

    शनि साढ़ेसाती एक ज्योतिषीय प्रक्रिया है जिसमें शनि ग्रह की दैहिक गति के कारण तीन राशियों में उच्च दृष्टि देने से उन राशियों के जातकों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहाँ निम्नलिखित है शनि साढ़ेसाती के सम्पूर्ण उपाय, मंत्रों सहित:

    उपाय और मंत्र:

    1. शनि देव की पूजा: शनि साढ़ेसाती के प्रभाव को कम करने के लिए शनि देव की पूजा करें। "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का जाप करें और शनि देव की मूर्ति की पूजा करें।

    2. शनि ग्रह का मंत्र जाप: "ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः" मंत्र का जाप करने से शनि साढ़ेसाती के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है।

    3. शनिवार की व्रत: शनिवार के दिन शनि देव की पूजा और अर्चना करें। उपवास रखकर "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का जाप करें।

    4. दान करें: शनि साढ़ेसाती के दौरान दान करने से भी उपाय मिल सकते हैं। गुड़, तिल, काला उड़द, नीलम, अखरोट, साबुत उदद आदि का दान करें।

    5. शनि की शांति पूजा: ग्रह शनि की शांति के लिए शनि पूजा करें और "शनि ग्रह मंत्र" का जाप करें।

    6. शनि अमावस्या का व्रत: शनि की अमावस्या को व्रत रखकर "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का जाप करें।

    7. अन्य उपाय: आपके ज्योतिष शास्त्र के विशेषज्ञ से सलाह लें और उनके सुझावानुसार अन्य उपाय भी करें, जैसे कि रत्न धारण करना, यज्ञ करना आदि।

    8. शनि देव की पूजा का सम्पूर्ण विधान

      शनि देव की पूजा करने से आप शनि ग्रह के दुष्प्रभावों को कम कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। निम्नलिखित है शनि देव की पूजा का सम्पूर्ण विधान:

      सामग्री:

      1. पूजा स्थल: शुद्ध और शांतिपूर्वक पूजा स्थल तैयार करें, जैसे कि पूजा घर या मंदिर।
      2. पूजा सामग्री: शनि देव की मूर्ति या तस्वीर, तिल, तेल, अगरबत्ती, दीपक, धूप, फूल, नीलम, अखरोट, गुड़, सुपारी, काला उड़द, नौ दानिया, गंध, पानी, चावल आदि।

      पूजा विधी:

      1. अंधकार निवारण: पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद, अंधकार को दूर करने के लिए दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
      2. पूजा स्थल सजाना: पूजा स्थल को पुष्प, धूप, अगरबत्ती आदि से सजाएं।
      3. पूजा सामग्री: शनि देव की मूर्ति या तस्वीर को सामने रखें और उनकी पूजा के लिए आवश्यक सामग्री को एकत्र करें।
      4. प्राण प्रतिष्ठा: शनि देव की मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा दें, यानी उन्हें जीवंत मानें और उनका स्वागत करें।
      5. पूजा आराम्भ: शनि देव की मूर्ति को उनकी प्रिय अर्चना सामग्री से पूजें, जैसे कि तिल, तेल, गंध, अखरोट, गुड़, सुपारी, काला उड़द आदि।
      6. मंत्र जाप: "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करें।
      7. आरती: शनि देव की मूर्ति की आरती करें और उन्हें धूप और दीपक से पूजन करें।
      8. प्रसाद वितरण: पूजा के बाद बनाया हुआ प्रसाद दीपक, दूध, अखरोट, गुड़, सुपारी, काला उड़द आदि के साथ शनि देव की मूर्ति के चारों ओर घुमाएं और फिर उसे देवों के बीच में बांटें।
      9. शनि ग्रह का दसरथ अस्त्रोत

        शनि ग्रह का दसरथ अस्त्रोत एक प्रमुख मंत्र है जिसका जाप करने से आप शनि ग्रह के दुष्प्रभावों को कम कर सकते हैं और उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हैं। निम्नलिखित है शनि ग्रह का दसरथ अस्त्रोत:

        शनि ग्रह का दसरथ अस्त्रोत:

        "नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌।
        छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌॥"

        जाप विधी:

        1. पूजा स्थल: शुद्ध और शांतिपूर्वक पूजा स्थल तैयार करें, जैसे कि पूजा घर या मंदिर।
        2. पूजा सामग्री: शनि ग्रह की मूर्ति या तस्वीर, अगरबत्ती, दीपक, धूप, फूल, नीलम, अखरोट, गुड़, सुपारी, काला उड़द आदि।
        3. माला: दसरथ अस्त्रोत का 108 माला जाप करने के लिए माला।

        जाप विधी:

        1. अंधकार निवारण: पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद, अंधकार को दूर करने के लिए दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
        2. पूजा स्थल सजाना: पूजा स्थल को पुष्प, धूप, अगरबत्ती आदि से सजाएं।
        3. पूजा सामग्री: शनि ग्रह की मूर्ति या तस्वीर को सामने रखें और उनकी पूजा के लिए आवश्यक सामग्री को एकत्र करें।
        4. मंत्र जाप: "नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्‌।
        5. छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌॥"
        6. मंत्र का 108 बार जाप करें।
        7. ध्यान: मंत्र जाप के दौरान शनि ग्रह की मूर्ति को ध्यान में रखें और उनके स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करें।
        8. प्राण प्रतिष्ठा: शनि ग्रह की मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा दें, यानी उन्हें जीवंत मानें और उनका स्वागत करें।
        9. आरती: मंत्र जाप के बाद शनि ग्रह की मूर्ति की आरती करें और उन्हें धूप और दीपक से पूजन करें।
        10. प्रसाद वितरण: पूजा के बाद बनाया हुआ प्रसाद दीपक, दूध, अखरोट, गुड़, सुपारी, काला उड़द आदि के साथ शनि ग्रह की मूर्ति के चारों ओर घुमाएं और फिर उसे देवों के बीच में बांटें।

        जाप की संख्या:

        दसरथ अस्त्रोत का 108 माला जाप करें। यदि संभावना हो तो आवश्यकतानुसार आधे माला भी किया जा सकता है, जैसे 54 मंत्र का जाप।

      10. शनि ग्रह और सुंदरकांड पाठ

      11. शनि ग्रह के दुष्प्रभावों को कम करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए सुंदरकांड पाठ एक प्रमुख उपाय हो सकता है। सुंदरकांड पाठ करने से न केवल भक्ति में वृद्धि होती है, बल्कि यह ग्रहों के प्रभावों को भी शांत करने में मदद कर सकता है। निम्नलिखित है शनि ग्रह के प्रभाव को कम करने के लिए सुंदरकांड पाठ की सम्पूर्ण विधि:

        सुंदरकांड पाठ:

        सुंदरकांड पाठ करने से पहले आपको सामग्री की तैयारी करनी होगी।

        सामग्री:

        1. सुंदरकांड पुस्तक: आपके पास सुंदरकांड की पुस्तक होनी चाहिए।
        2. पूजा सामग्री: दीपक, धूप, अगरबत्ती, फूल, आदि।
        3. पूजा स्थल: शुद्ध और शांतिपूर्वक पूजा स्थल तैयार करें, जैसे कि पूजा घर या मंदिर।

        पाठ विधी:

        1. अंधकार निवारण: पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद, अंधकार को दूर करने के लिए दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
        2. पूजा स्थल सजाना: पूजा स्थल को पुष्प, धूप, अगरबत्ती आदि से सजाएं।
        3. पूजा सामग्री: सुंदरकांड पुस्तक को सामने रखें और पूजा सामग्री को आवश्यकतानुसार एकत्र करें।
        4. पूजा आराम्भ: सुंदरकांड पुस्तक का पाठ आरंभ करें। आप इसे एक बार, तीन बार, पाँच बार या बिना बार बताये जितनी बार पढ़ना चाहें, वैसे बार पढ़ सकते हैं।
        5. ध्यान: सुंदरकांड पाठ करते समय ध्यान में रहें और पाठ में श्रद्धा और भक्ति रखें।
        6. प्राण प्रतिष्ठा: सुंदरकांड पुस्तक को प्राण प्रतिष्ठा दें, यानी उसका सम्मान करें और पूजन करें।
        7. आरती: सुंदरकांड पाठ के बाद उसकी आरती करें और उसे धूप और दीपक से पूजन करें।
        8. प्रसाद वितरण: पूजा के बाद बनाया हुआ प्रसाद धूप, दीपक, फूलों के साथ सुंदरकांड पुस्तक के आगे रखें और फिर उसे देवों के बीच में बांटें।

        पाठ की संख्या:

        सुंदरकांड पाठ की संख्या आपकी आवश्यकतानुसार हो सकती है। आप रोजाना या सप्ताह में कुछ दिनों तक सुंदरकांड पाठ कर सकते हैं।

      12. शनि साढ़ेसाती के उपाय:शनि की दशा में शनिवार को नीले रंग के कपड़े पहनें और शनि देवता की पूजा करें।शनि के दोष को कम करने के लिए शनि ग्रह के मंत्र का जाप करें और उसकी शांति के लिए पूजा-अर्चना करें।

        1. राहु-केतु दोष: राहु और केतु ग्रह की अशुभ स्थिति भी विवाह में बाधक योग पैदा कर सकती है। यह दोष विवाह में संघर्ष और असमंजस को बढ़ावा देने में सहायक हो सकता है।

        2. राहु-केतु दोष के उपाय:

          • राहु-केतु के प्रभाव को कम करने के लिए केतु ग्रह के मंत्र का जाप करें और उसकी पूजा करें।
          • विवाह में बाधक योगों के प्रभाव को कम करने के लिए राहु-केतु के उपायों का पालन करें और आचार्य या पंडित से सलाह लें।

        ज्योतिष शास्त्र इन बाधक योगों के प्रभाव को जानने के बाद उपायों की सिफारिश करता है जिनसे यह योग प्रभावित हो सकते हैं। यह उपाय विवाह में आने वाली चुनौतियों को कम करने में मदद कर सकते हैं और विवाहित जीवन को सुखमय बना सकते हैं।

        ✍🏻जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है। सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है। सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है। लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं। सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है। छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है। यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है!
        *"ज्योतिष, वास्तुशास्त्र, 



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